अद्वैत

ajeetpalsingh2014
क्राइम थ्रिलर
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75 वर्ष के एकांतप्रिय, भूतपूर्व शल्य चिकित्सक ‘बलवीर नागपाल’ आज अपने बंगले की दूसरी मंजिल पर बने भंडार-कक्ष में अपनी पुरानी साथी ‘दोलन कुर्सी’ पर ही बैठकर प्राकृतिक छटाओं, उड़ते पक्षियों और सूर्योदय को एकटक निहार रहे थे। हरित और हिमाच्छादित पर्वतों के बीच लगभग पांच बीघे में घास और फलों के वृक्षों से भरी इस हरी भरी भूमि के बीच उनका सफ़ेद रंग का पुराना जर्जर बँगला था।

नागपाल की आँखों में बेहद पीड़ा, परन्तु आशा के भाव थे। उनकी दृष्टि के समक्ष भूतकाल किसी ‘भूत’ की भांति नृत्य कर रहा था.

25 वर्ष पहले कोई संतान नहीं थी उनके पास, लेकिन वे फिर भी खुश थे। 50 साल के नागपाल और 45 साल की 'मणि' संतान ना होने को ईश्वर की मर्जी मान चुके थे। ईश्वर कभी किसी की हथेली पूरी नहीं भरता, क्योंकि बिना हाथों के व्यक्ति 'अकर्मण्य' की श्रेणी में आता है। ये उनको ज्ञात था।

नागपाल की शल्य चिकित्साओं में 'तंत्र' के प्रयोग को कई लोगों ने देखा और उस अमुक 'असामान्य' प्रक्रिया को एक हौवा बनाते हुए उनको 'व्यवसाय की प्रतिद्वंदिता' या फिर 'व्यक्तिगत द्वेष’ के चलते उनको कलंकित करने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था और उसमें पूर्णरूपेण सफल भी हो गए थे।

परिणामस्वरूप डॉक्टर नागपाल को अपने पेशे में विगत 25 वर्षों से ही 'अद्वितीय चिकित्सक' होते हुए भी एक ‘झोलाछाप तांत्रिक चिकित्सक’ के जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा था। पहले उनके ही द्वारा खड़े किये गए अस्पताल से उनका निष्कासन, उसके बाद समाज के ताने और कई बार कानूनी समस्याओं जैसे ओलों को बिना छतरी के सहन करना, और मानसिक प्रताड़ना अलग से। कठोर से कठोर चट्टान टूट जाती है परन्तु नागपाल किसी वज्र के सामान थे, जो स्वयं ही भीतर से टूट गया।

25 वर्ष पूर्व की स्मृतियों का सजीव चित्रण, उनके मस्तिष्क में तूफ़ान के सदृश चल रहा था।

सूर्यास्त के समय नागपाल अपने इसी भंडार कक्ष में ढलते सूर्य को एक लकड़ी की चटाई पर बैठकर घूर रहे थे। ध्यान की इस प्रक्रिया को पाश्चात्य में 'सन गेजिंग' और भारत में 'सूर्य त्राटक' कहते हैं।

खिड़कियां खुली थीं ताकि पेड़ पौधों की खुशबू और प्राकृतिक हवा कमरे के साथ उनकी आत्मा में भी प्रवेश कर सके।

विगत बीस वर्षों का नियमित सूर्य त्राटक उनके अंदर एक विशेष शक्ति का आविर्भाव कर चुका था। जिसका उन्होंने जीवन में कई विशेष परिस्थितियों में उपयोग भी किया था और उसके कुछ नकारात्मक परिणामों का भी सामना किया था, लेकिन आज जो उनके जीवन में घटने वाला था, वो सबकुछ बदल देने वाला था।

स्नेह से परिपूर्ण, बड़े बड़े नेत्रों वाली मणि अपने पुराने और विश्वासपात्र सहायक लाखा के साथ रसोई में लाखा की पैतालीसवीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में गरीब जरूरतमंदों में वितरित करने के लिए नाना प्रकार के व्यंजन बनाने में व्यस्त थीं। उनके शौकों में कांजीवरम साड़ियाँ थीं, जो उनको एक शुद्ध भारतीय नारी का अवतार बनती थीं।

दो बुरे लोगों के अच्छे मित्र बनने की सम्भावना उतनी नहीं होती जितनी की दो अच्छे लोगों की। डॉक्टर बलवीर और मणि पति-पत्नी से अधिक अच्छे मित्र थे। मणि डॉक्टर बलवीर के आत्मज्ञान, ध्यान और निस्वार्थ प्रवृत्ति की कायल थीं, और नागपाल उनकी मातृत्व और निष्कपट प्रवत्ति के।

उनका रिश्ता और अंतर्मन पूर्ण होने के कारण उनके अंदर कोई कमी, संताप या दुःख नहीं था जिसे पूर्ण करने के लिए वे बच्चा 'गोद' भी ले लेते। ना ही वंश आगे बढ़ाने की कोई लालसा, ना सम्पति के रक्षण और विकास का कोई लालच। पूर्णरूपेण निष्कपट, निस्वार्थ, देवतुल्य युगल।

दोपहर के समय उनके घर किसी किसी अनजान, परेशान, धनी अधेड़ दंपत्ति का आगमन हुआ।

उनकी मनोस्थिति को भांपते ही मणि ने उनको अंदर बुला लिया और उनको बैठाकर उनकी पीड़ा जानी तो पाया कि उनकी संतान गर्भ के अंदर जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही है। उनकी संतान एक ना होकर दो हैं, परन्तु लगभग एक ही हैं।

स्थिति बेहद अजीबोगरीब थी।

दंपत्ति ने रहस्योद्घाटन किया कि वे करीब पंद्रह सौ किलोमीटर दूर से उनके पास आये हैं। चिकित्सक नागपाल के बारे में उन्होंने कुछ लोगों से सुना है, जिन्होंने बताया की वे शल्य चिकित्सा के प्रकांड विद्वान हैं। पति मोहक सेन हीरों का व्यापारी है और पत्नी नंदिनी सेन के पेट में पल रहे 2 जुड़वां बच्चे इस भांति जुड़े हुए हैं कि उनके अलग होने का कोई चिन्ह नहीं था। यदि चिकित्सक नागपाल उनको सकुशल जन्म दिलवाकर अलग कर देते हैं तो वे उनको उनका इच्छित धन देने को तैयार थे। बड़े से बड़ा, और महंगे से महंगा चिकित्सक भी अपने हाथ खड़े कर चुका था। विभिन्न उच्च तकनीकी यंत्रों के माध्यम से भी वे इस गुत्थी को सुलझाने में असमर्थ थे।

ममतामयी मणि प्रगाढ़ता से किसी माँ का दर्द समझ सकती थी। मणि ने कभी जीवन में अपने पति रुपी शिक्षक के सूर्य त्राटक के समय विध्न नहीं डाला था। परन्तु इस दिन उन्होंने ये कार्य अपने अंदर छिपी एक अपूर्ण माँ के कहने पर किया।

नागपाल ने उस दोपहर से लेकर शाम तक लगभग 4 घंटे शल्य चिकित्सा में लगाए। उनके बच्चों को सकुशल गर्भ से बाहर लाने के लिए। मणि ने पूरा साथ दिया।

कठिनाई ये थी की वे दोनों बच्चे उनकी पीठ से इस भांति जुड़े थे कि पूरा मेरुदंड और मस्तिष्क जुड़ा होने के कारण वे एक सिक्के के दो पहलू लग रहे थे। यह अविश्वसनीय मामला था।

चुनौती शब्द ही बना है उसे पूरा करने के लिए अन्यथा ये 'असंभव' में बदल जाता है। नागपाल के लिए शल्य चिकित्सा से जुड़ा हर 'असंभव' मामला प्रायः 'चुनौती' ही बन जाता था। उन्होंने 6 घंटे के अथक प्रयास के बाद उन दोनों बच्चों को सकुशल अलग कर दिया। परन्तु मुसीबत अभी टली नहीं थी।

उनमें से एक बच्चा अभी बेहोशी में था और दूसरा होश में। दंपत्ति खुश थे की बच्चे सकुशल हैं परन्तु बेहोश शिशु को लेकर थोड़े चिंतित भी। ये चिंता अधिक हो सकती थी यदि नागपाल के स्थान पर कोई और चिकित्सक होता। ‘नितांत विश्वास’।

जब कुछ घंटो तक बेहोश शिशु में होश के कोई लक्षण दिखाई नहीं दिए तो नागपाल ने दंपत्ति को उनके कुशल शिशु के साथ अपने घर वापस लौट जाने के लिए दबाव डाला। पहले तो दंपत्ति को बड़ा आश्चर्य हुआ, परन्तु जब नागपाल ने विश्वास दिलाया की वे जल्द ही शिशु को होश में ले आएंगे, तब वे मान गए और रात को ही अपने होटल जाने के लिए वापस लौट गए। मणि ने आपत्ति भी जताई थी की रात के समय जच्चे और नवजात शिशु का यात्रा करना ठीक नहीं है, परन्तु नागपाल ने बताया की वे शिशु के अभिवावकों के रहते अपना कार्य समय से पूरा नहीं कर पाएंगे।

नागपाल के अनुसार वे सही थे, पर ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था।

पूरी रात जब शिशु को होश नहीं आया, तब नागपाल ने सुबह निर्णय लिया कि वे शिशु को तंत्र के माध्यम से होश में लाएंगे।

सूर्योदय के समय नागपाल और मणि को अख़बार में छपी ये विषादपूर्ण सूचना लाखा ने दी,

"हीरों के सुप्रसिद्ध व्यापारी मोहक सेन और उनकी धर्मपत्नी नंदिनी सेन की कार आधी रात के समय नेशनल हाईवे पर दुर्घटनाग्रस्त। दंपत्ति ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। उनका नवजात शिशु और ड्राइवर दुर्घटना में बच गए"।

मणि और नागपाल ये लिए ये सुचना विक्षुब्ध कर देने वाली थी।

लोकोक्ति है कि 'दुर्भाग्य कभी अकेला नहीं आता', जो सच हो गयी थी।

बेहोश शिशु मृत हो चुका था।

ये स्थिति मणि और नागपाल की उम्र और स्वाभाव के अनुसार अवसाद में ले जाने वाली थी, परन्तु ये युगल बुद्धिजीवी और साहसी था।

नागपाल ने जीवन में असंभव को चुनौती बनाना सीखा था।

उन्होंने तंत्र के माध्यम से अथक प्रयास के बाद आत्मा को बाध्य कर दिया शिशु के शरीर में दोबारा जाने के लिए।

परन्तु ये शिशु की पूर्व आत्मा नहीं थी।

परन्तु बुद्धिजीवी युगल इस बात से पूर्णतयाः अनभिज्ञ था।

शिशु के जुड़वां भाई और कार चालक का कोई अता पता नहीं था, क्योंकि उस कालखंड में संचार के आधुनिक माध्यम ना के बराबर थे।

समय बीता, शिशु अब लगभग बारह वर्ष का हो चुका था। मणि और नागपाल प्रायः यही सोचते थे की उनकी संतान की कमी पूर्ण हो चुकी है, परन्तु बालक 8 वर्ष का होते ही दुष्ट प्रवृत्ति का हो चुका था।

पिछले 4 वर्षों में उस बालक ने दुष्टता का ऐसा तांडव मचाया था की मणि और नागपाल जैसे बुद्धिजीवी शांत देवदूत जैसा युगल भी क्रोधी और अवसादी हो चुका था।

निरीह छोटे प्राणियों पर अत्याचार करना, उनको मारना, विद्यालय में झगडे, लड़ाइयां, विद्या से कोसों दूरी के कारण विद्यालय से निष्कासन, क्रोधी स्वाभाव के कारण क़ानूनी कार्रवाई तक हो जाना इत्यादि। वह बालक पूरा राक्षस था।

वह काला दिन तब आया जब, नागपाल की अनुपस्थिति में वह नन्हा राक्षस रक्तरंजित हाथों से घर में आकर छिप गया। मणि ने जब कड़ाई के साथ उसको पकड़कर सत्य जाना तो पाया की खेल के मैदान में क्रोधित होकर वह किसी समवयस्क बालक की पत्थर पर सर पटक पटक कर हत्या करके भाग आया है।

क्रोध में मणि ने फ़ोन बूथ में जाकर पुलिस को फ़ोन कर दिया।

मणि का जीवन में पहली बार आवेश में लिया निर्णय उसके लिए काल का ग्रास बन गया। मणि के घर में लौटते ही उसे दिखाई दिया टूटा फूटा सामान।

बालक भाग चुका था। बड़ा चालू लैंप तोड़कर फर्श पर डाला गया था। फर्श पर लाखा मृत पड़ा था, उसके माथे पर घाव और कांच थे। लैंप जहाँ पड़ा था वह पानी बिखेरा हुआ था। लाख की स्थिति देखकर मणि उसकी ओर दौड़ी और नग्न पाँव पानी में पड़ने के कारण……

वृद्धावस्था में भी कुछ खौल रहा था उनके हृदय में। उनकी दृष्टि सामने टेबल पर पड़े अख़बार पर पड़ीं, जिसके मुखपत्र पर ही खबर थी…

"नेपाल की राजधानी काठमांडू के सबसे बड़े बैंक में हुई हथियारबंद लूट को अंजाम देने वाले गैंग का युवा सरगना वृजेन्द्र उर्फ़ ‘खोपड़ी’, नेपाल प्रशासन को चकमा देकर फरार। सूत्रों के हवाले से वह भारत के हिमाचल प्रदेश के किसी शहर में देखा गया है।"

नागपाल के नेत्रों के पीड़ा के भाव अब क्रोध के भावों में बदल चुके थे। खिड़की से दूर से ही आती एक काली गाड़ी को देखकर उनके नेत्रों के क्रोध के भाव अब चमक में बदल चुके थे।

कुछ देर बाद उनके सामने उनका स्याह भूतकाल खड़ा था।

उनकी अप्रत्याशित भगौड़ी संतान, वृजेन्द्र उर्फ़ खोपड़ी नाम से विख्यात कलंकित डाकू बन चुकी थी।

रक्त का घूँट पीकर नकली मुस्कान के साथ नागपाल बदमाश के गले लग गए।

"माना कि तुमने मुझे बहुत दुख दिए हैं, परन्तु तुम मेरी एकमात्र संतान हो और इस बुढ़ापे में मैं तुमसे सहारा चाहता हूँ मेरे बेटे!" कहते हुए नागपाल के नेत्रों में रक्त की नलिकाएं दिख रही थीं।

"बिलकुल पापा! में आपका सहारा बनूँगा अब! आपकी इतनी सारी अचल संपत्ति को सम्हालने के लिए कोई तो चाहिए, वरना सब सरकार के पास चला जायेगा! और मैं एक अच्छा आदमी बनना चाहता हूँ!" बदमाश के इन शब्दों का नागपाल को पूर्वानुमान था। वे उसे लेकर अपने शल्य चिकित्सा कक्ष में पहुंचे।

सामने बदमाश के हमशक्ल का अचेत शरीर रखा था। नागपाल ने एक बड़ा स्टील का चाकू बदमाश को दे दिया।

"इसका समाज में बहुत सम्मान है! और इसके बाद इसकी पहचान तुम्हारी! बहाना बनाकर बुलाया था इसे! मैंने तुम्हे पाला है इसलिए मैंने तुम्हारा चुनाव किया है!"

नागपाल की बात पूर्ण होते ही बदमाश ने शैतानी अट्टाहस किया और चाक़ू को हमशक्ल के शरीर में उतार दिया। पर रक्त का नामोनिशान नहीं था। उसे लगा की उसने किसी रबर पर चाकू घुसाया है।

चाक़ू के छाती में घुसते ही बदमाश का शरीर विधुत से थर्रा उठा। वह मृत्यु की तड़प थी। उसको तड़पता देख नागपाल के मस्तिष्क में मणि और लाखा के मृत शरीर दिखाई दे रहे थे।

विधुत से मृत्यु होने के कुछ क्षण पहले बदमाश ने अपनी आँखों के सामने स्वयं को ही नागपाल के बगल में, किसी चालक की पोशाक पहने वृद्ध व्यक्ति के साथ खड़ा देखा।

मृत्युपूर्व उसे कुछ शब्द सुनाई दिए........

"ये मेरा बड़ा भाई जरूर है पर भाई कहलाने लायक नहीं! इसके जैसी शक्ल होने के कारण मुझे जीवन में कितनी खतरनाक परेशानियों का सामना करना पड़ा! इसी कारण ड्राइवर काका ने मुझे बचपन की पूरी कहानी बताई, और मुझे यहाँ लेकर आये! देर ही सही पर न्याय तो हुआ! !"

"परमात्मा ने शायद मुझे इसीलिए जीवित रखा था! उसके घर में देर है पर अंधेर नहीं! अब मैं चैन से मर सकता हूँ!"

"आप ऐसी बातें मत कीजिये! आप मेरे पिता हैं! आपने ही मुझे इस राक्षस से अलग किया था! मैं आज से आपके जीवन का हिस्सा हूँ!"

काल का ग्रास बनने से पूर्व वह सब कहानी जान चुका था।

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